unit - 4 - वास्तविक प्रभु की जानकारी पार्ट 2

परम अक्षर ब्रह्म गीता ज्ञान दाता से अन्य है।


गीता ज्ञान दाता ने स्वयं गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे भारत! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म की शरण में जा, उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा शाश्वत स्थान अर्थात् सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।
गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि तत्वदर्शी सन्त मिलने के पश्चात् तत्वज्ञान रूपी शस्त्रा द्वारा अज्ञान को काटकर परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर कभी संसार में जन्म नहीं लेते अर्थात् उनको सनातन परम धाम प्राप्त हो जाता है, जहाँ परमशान्ति है, कोई कष्ट नहीं है, वहाँ मृत्यु नहीं होती, वहाँ वृद्धावस्था नहीं होती, किसी पदार्थ का अभाव नहीं हैं। जिस परमेश्वर से संसार रूपी वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी परमेश्वर की भक्ति करनी चाहिए।
गीता अध्याय 13 श्लोक 17 में गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि वह परब्रह्म अर्थात् मेरे से दूसरा प्रभु दूसरे शब्दों में परम अक्षर ब्रह्म(जिसके विषय में गीता अध्याय 8 श्लोक 3 में कहा है।) ज्योतियों का भी ज्योति, माया से अति परे कहा जाता है, बोधरूप (जानने योग्य) परमात्मा तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है। (गीता अध्याय 13 श्लोक 17)
विचार करें:- जिस तत्वज्ञान से परम अक्षर ब्रह्म प्राप्त होता है, उसे सू़क्ष्म वेद भी कहते हैं। उसका ज्ञान गीता ज्ञान दाता को नहीं है। इसलिए गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में बताया है कि यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तारपूर्वक ज्ञान स्वयं (ब्रह्मणः मुखे) सच्चिदानन्द घन ब्रह्म परमात्मा अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म अपने मुख कमल से बोलकर बताता है जो सच्चिदानन्द घन ब्रह्म की वाणी कही जाती है, उसे तत्वज्ञान कहते हैं। उसे जानकर साधक सर्व पापों से मुक्त हो जाता है। (गीता अध्याय 4 श्लोक 32) 
पाठकों से निवेदन है कि गीता अध्याय 4 श्लोक 32 के मूल पाठ में “ब्रह्मणः” शब्द है। गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित गीता या अन्य स्थानों सेप्रकाशित गीता में अनुवादकों ने ब्रह्मणः का अर्थ “वेद” किया है जो गलत है।
गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में भी “ब्रह्मणः” शब्द है, उसमें अनुवादकों ने ठीक अर्थ “सच्चिदानन्द घन ब्रह्म” किया है। इसलिए गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में “ब्रह्मणः मुखे” का अर्थ सच्चिदानन्द घन ब्रह्म के मुख कमल से उच्चरित वाणी में करना उचित है।
गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि उस तत्वज्ञान को जिसे परमेश्वर अपने मुख कमल से बताता है, तू तत्वदर्शी सन्तों के पास जाकर समझ, उनको दण्डवत् प्रणाम करने से, नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भली-भाँति जानने वाले तत्वदर्शी महात्मा तुझे तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे।
प्रभु प्रेमी पाठक जनों! इससे सिद्ध हुआ कि वह तत्वज्ञान जिससे परम अक्षर परमात्मा प्राप्त होता है, गीता ग्रन्थ में नहीं है। गीता चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) का संक्षिप्त रूप है, उनका सारांश है। इससे सिद्ध हुआ कि सूक्ष्मवेद वाला तत्वज्ञान किसी भी प्रचलित सद्ग्रन्थ में नहीं है। वह ज्ञान मेरे (सन्त रामपाल दास) पास है, विश्व में किसी के पास नहीं है।
प्रश्न:- क्या श्री ब्रह्मा जी रजगुण, श्री विष्णु जी सतगुण तथा श्री शिव जी तमगुण भी ईष्ट रूप में पूज्य नहीं है? हिन्दू धर्म में इन्हीं देवताओं की पूजा की जाती है। हिन्दू धर्मगुरू, शंकराचार्य तथा अन्य इन्हीं की पूजा ईष्ट रूप में मानकर करने को कहते हैं, वे स्वयं भी करते हैं। आपकी बात अविश्वसनीय लगती है, क्या आप गीता में प्रमाणित कर सकते हैं?
उत्तर:- हिन्दू धर्म के धर्मगुरूओं को अपने सद्ग्रन्थों का ही ज्ञान नहीं। जैसे अक्षर ज्ञान देने वाले अध्यापक को अपने पाठ्यक्रम की पुस्तकों के उल्लेख का ही ज्ञान नहीं तो वह अध्यापक विद्यार्थियों के लिए हानिकारक होता है। वह शिक्षक ठीक नहीं, यही दशा हिन्दू धर्म के धर्मगुरूओं की है।
प्रमाण:- श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि तीनों गुणों से (रजगुण श्री ब्रह्मा जी से उत्पत्ति, सतगुण श्री विष्णु जी से स्थिति तथा तमगुण श्री शंकर जी से संहार) जो हो रहा है, उसका निमित मैं हूँ, परंतु उनमें मैं तथा वे मुझमें नहीं हैं। (गीता अध्याय 7 श्लोक 12), पहले यह प्रमाणित करते हंै कि रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव शंकर है:-
1. मार्कण्डेय पुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित केवल हिन्दी सचित्र मोटा टाईप) के पृष्ठ 123 पर लिखा है कि ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ब्रह्म की प्रधान शक्तियाँ हैं। ये ही तीन गुण हैं, ये ही तीन देवता हैं।
2. श्री देवी पुराण (श्री खेमचन्द श्री कृष्ण चन्द वैंकेटेश्वर प्रैस मुम्बई से प्रकाशित) के तीसरे स्कंद के अध्याय 5 श्लोक 8 में कहा है:-
यदा दयादर्मना सदा अम्बिके कथम् अहमं विहितः तमोगुणः कमलजः रजगुणः कथम् विहितः च श्री हरिः सतगुणः (देवी पुराण 3/5/8)
अनुवाद:- भगवान शिव अपनी माता दुर्गा जी से प्रश्न कर रहे हैं कि हे मातः! यदि आप हम पर दयायुक्त हैं तो मुझे तमोगुण क्यों उत्पन्न किया? कमल से उत्पन्न ब्रह्मा जी को रजोगुण तथा श्री विष्णु जी को सतगुण क्यों बनाया?
इससे प्रमाणित हुआ कि 1. रजगुण कहो चाहे ब्रह्मा जी कहो, 2. सतगुण कहो चाहे विष्णु जी कहो, 3. तमगुण कहो चाहे शिव जी कहो।
गीता अध्याय 7 श्लोक 12 का भावार्थ:- गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म है। प्रमाण गीता अध्याय 11 श्लोक 31.32, अध्याय 11 श्लोक 31 में अर्जुन ने पूछा किः- हे महानुभाव! आप कौन हैं? जबकि श्री कृष्ण जी तो अर्जुन के साले थे। श्री कृष्ण जी की बहन सुभद्रा का विवाह अर्जुन से हुआ था। विचार करें कि यदि गीता ज्ञान दाता श्री कृष्ण होते तो अर्जुन को यह जानने की नौबत नहीं आती कि आप कौन हो? क्या जीजा अपने साले को नहीं जानता? वास्तव में श्री कृष्ण जी के शरीर में प्रेतवत् प्रवेश करके काल ब्रह्म गीता ज्ञान बोल रहा था। (“अधिक प्रमाण के लिए पढें़ पुस्तकें “गीता तेरा ज्ञान अमृत”, ‘‘गहरी नजर गीता में‘‘, “ज्ञान गंगा”, आध्यात्मिक ज्ञान गंगा तथा देखें सत्संगों की क्ण्टण्क्ण् श्री मद्भगवत गीता का ज्ञान किसने बोला। ये सब हमारी website www.jagatgururampalji,irg पर उपलब्ध है, निःशुल्क डाउनलोड कर सकते हैं। ल्वनज्नइम पर भी ैमंतबीकर सकते हैं। (satsang barwala ashram or sant rampal ji) गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म है जो गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में स्वयं कह रहा है कि मैं काल हूँ, अब प्रवृत हुआ हँू अर्थात् अब प्रकट हुआ हूँ। यदि श्री कृष्ण जी गीता ज्ञान बोल रहे होते तो यह नहीं कहते कि मैं अब आया हूँ क्योंकि श्री कृष्ण जी तो पहले ही विद्यमान थे। श्री कृष्ण जी ने कभी पहले नहीं कहा कि मैं काल हूँ, न कभी बाद में कहा कि सबका नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ। कौरवों की सभा में अपना विराट रूप भी दिखाया था। विराट रूप भक्ति युक्त प्रत्येक आत्मा का होता है। कोई-कोई ही इसे प्रकट कर सकता है। यह भक्ति की शक्ति अनुसार होता है।
गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 11 श्लोक 47 में कहा है कि अर्जुन! मेरा यह विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है। “पाठकों से निवेदन है कि श्री कृष्ण जी ने तो अपना विराट रूप पहले कौरवों की सभा में दिखाया था” जो उपस्थित संैकड़ों कौरवों सहित हजारों ने देखा था। यदि श्री कृष्ण जी गीता ज्ञान बोल रहे होते तों यह कदापि नहीं कहते कि यह मेरा विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था। इससे स्पष्ट है कि गीता ज्ञान दाता “काल ब्रह्म” है जिसे गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में क्षर पुरूष कहा गया है। जिसने गीता अध्याय 8 श्लोक 13 में कहा है कि:-
“ओम् इति एकाक्षरम् ब्रह्म व्यवहारन् माम् अनुस्मरन्
यः प्रयाति त्यजन् देहम् सः याति परमाम् गतिम्”
सरलार्थ:- गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि (माम् ब्रह्म) मुझ ब्रह्म का (ओम् इति एकाक्षरम्) यह एक ऊँ अक्षर है। (व्यवहारन्) उच्चारण करके (अनुस्मरन्) स्मरण करता हुआ (यः प्रयाति त्यजन् देहम्) जो साधक शरीर त्यागकर जाता है, (सः याति परमाम् गतिम्) वह ऊँ नाम से होने वाली परम गति को प्राप्त होता है, इसी को और स्पष्ट करता हूँ।
श्री देवी पुराण (सचित्रा मोटा टाईप केवल हिन्दी, गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित) के सातवें स्कंद में पृष्ठ 562.563 पर प्रकरण इस प्रकार है:-
श्री देवी जी राजा हिमालय को ब्रह्म ज्ञानोपदेश देती है। कहा कि हे राजन्! तू ओम् (ऊँ) नाम का जाप कर जिससे ब्रह्म की प्राप्ति होती है। यह ऊँ नाम ब्रह्म जाप मन्त्र है और सब बातों को, पूजाओं को त्यागकर केवल एक ऊँ नाम का जाप कर, ब्रह्म प्राप्ति का उद्देश्य रख, तेरा कल्याण हो। इससे ब्रह्म को प्राप्त हो जाएगा, वह ब्रह्म दिव्य आकाश रूपी ब्रह्म लोक मंे रहता है। इस देवी महापुराण से स्पष्ट हुआ कि ओम् (ऊँ) नाम जाप ब्रह्म का है।
अन्य प्रमाण:- श्री शिव महापुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित सचित्र मोटा टाईप) के विध्वेश्वर संहिता के पृष्ठ 23 से 25 पृष्ठ पर प्रकरण इस प्रकार हैः-
एक समय श्री ब्रह्मा जी रजगुण तथा विष्णु जी सतोगुण का युद्ध हो गया। कारण था कि श्री ब्रह्मा जी ने श्री विष्णु जी के निवास पर जाकर कहा कि हे अभिमानी! तूने मेरे आने पर उठकर सत्कार नहीं किया, तू पुत्रा होकर भी पिता का सत्कार नहीं करता। मैं सर्व जगत की उत्पत्ति करने वाला सबका पिता हूँ। यह वचन सुनकर श्री विष्णु जी को अंदर से तो बहुत क्रोध आया परंतु ऊपर से मुस्कुराते हुए कहा कि आजा पुत्र, मैं तेरा पिता हूँ। तेरी उत्पत्ति मेरे नाभि कमल से हुई है। इसी बात पर दोनों ने हथियार उठा लिए, आपस में युद्ध करने लगे। उसी समय काल ब्रह्म ने इन दोनों के बीच में एक तेजोमय स्तंभ खड़ा कर दिया। जिस कारण से दोनों ने युद्ध करना बंद कर दिया। उसी समय काल ब्रह्म ने अपने पुत्रा शिव का रूप बनाया तथा अपनी पत्नी दुर्गा को पार्वती बनाकर उनके पास प्रकट हो गए। उन दोनों से कहा कि तुम दोनों को ज्ञान नहीं है कि यहाँ का ईश कौन है? मैं ब्रह्म हूँ। यह संसार मेरा है, हे विष्णु तथा ब्रह्मा! तुम दोनों ने तप करके मेरे से एक-एक कृत प्राप्त किए हैं। ब्रह्मा को सृष्टि की उत्पत्ति तथा विष्णु को स्थिति। पुत्रो सुनो! मैनें इसी प्रकार महेश तथा रूद्र को भी एक-एक कृत संहार तथा तिरोभाव दिए हैं। फिर कहा है कि मेरा एक अक्षर ओम् (ऊँ) मन्त्र जाप करने का है। यह पाँच अवयवों (अ, उ, य, नाद तथा बिन्दु) का संग्रह एक ‘‘ऊँ‘‘ अक्षर मन्त्रा बना है। पाठक जनों को स्पष्ट हुआ कि ‘‘ऊँ‘‘ एक अक्षर ब्रह्म का जप मंत्र है। यह भी स्पष्ट हुआ कि श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री महेश से अन्य काल ब्रह्म है और ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी तीनों काल ब्रह्म के पुत्र हैं।
अन्य प्रमाण:- श्री शिव महापुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित, सचित्र मोटा टाईप) में रूद्र संहिता के पृष्ठ 110 पर लिखा है कि रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव तीनों देवताओं में गुण हैं। मैं इनसे भिन्न हूँ। इन सर्व प्रमाणों से स्पष्ट हुआ कि गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म है, इसे श्राप लगा है कि यह प्रतिदिन एक लाख मानव शरीरधारी प्राणियों को खाएगा तथा सवा लाख प्रतिदिन उत्पन्न करेगा।
इस कारण से इसने अपने तीनों पुत्रों को एक-एक गुणयुक्त बना रखा है, इनके शरीर से निकल रहे गुणों का सूक्ष्म प्रभाव प्रत्येक प्राणी को विवश करके कार्य करवाता है। जैसे रसोई घर में मिर्चों का छौंक लगता है, छींक आती है। उन छींकों को कोई नहीं रोक पाता। स्थूल रूप में मिर्च रसोई घर में होती हैं, उनसे निकले गुण ने दूर कमरे में बैठे व्यक्तियों को प्रभावित कर दिया।
इसी प्रकार तीनों देवता (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) अपने-अपने लोकों में रहते हैं, परन्तु उनके शरीर से निकल रहे गुणों का सूक्ष्म प्रभाव तीनों लोकों (स्वर्ग लोक, पाताल लोक, पृथ्वी लोक) के प्राणियों को प्रभावित करता रहता है। जिससे काल ब्रह्म के लिए एक लाख मानव का आहार तैयार होता है। इसीलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 12 में गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है किः- 
तीनों गुणों से जो कुछ भी हो रहा है, उसका निमित कारण मंै ही हूँ। जैसे रजगुण ब्रह्मा जी से उत्पत्ति, सतगुण विष्णु जी से स्थिति तथा तमगुण शिव जी से संहार होता है। यह सब मेरे लिए ही इनके द्वारा हो रहा है ऐसा जान, परन्तु वे मुझमें और मैं उनमें नहीं हूँ क्योंकि काल ब्रह्म इन तीनों देवताओं से भिन्न रहता है। (गीता अध्याय 7 श्लोक 12)
सारा संसार इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) पर ही मोहित है। इन्हीं तक ज्ञान रखता है। इन तीनों देवताओं से परे मुझको तथा (अव्ययम्) उस अविनाशी परमात्मा को नहीं जानता। (गीता अध्याय 7 श्लोक 13)
क्योंकि यह अलौकिक त्रिगुणमयी मेरी माया (अर्थात् मेरे पुत्रों द्वारा फैलाया मायाजाल) बड़ी दुस्तर है, निक्कमी है। जो साधक केवल मुझ (काल ब्रह्म) को भजते हैं, वे इस माया (ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भक्ति से होने वाले लाभ से अधिक लाभ ब्रह्म भक्ति में है। इसलिए कहा है कि जो इन तीनों से मिलने वाले लाभ को त्यागकर काल ब्रह्म की साधना करते हैं, वे इनका उल्लंघन करके अर्थात् इनकी साधना का त्याग कर देते हैं) का उल्लंघन कर जाते हैं। (गीता अध्याय 7 श्लोक 14)
गीता अध्याय 7 श्लोक 15 में कहा है कि:- तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) रूपी मायाजाल द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है अर्थात् जो साधक इन तीनों देवताओं से भिन्न प्रभु को नहीं जानते। इन्हीं से मिलने वाले नाममात्रा लाभ से ही मोक्ष मानकर इन्हीं से चिपके रहते हैं, इन्हीं की पूजा करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति असुर स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख जन मुझ काल ब्रह्म को नहीं भजते। (गीता अध्याय 7 श्लोक 15)
गीता अध्याय 14 श्लोक 19 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जिस समय दृष्टा अर्थात् तत्वज्ञान सुनने वाला और जो तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) की ईष्ट रूप में पूजा करने वाला अपनी पुरानी धारणा को नहीं बदलता अर्थात् इन तीनों के अतिरिक्त किसी को कर्ता नहीं मानता और इन तीनों से परे पूर्ण परमात्मा का ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है, वह मेरे ही जाल में रह जाता है। (गीता अध्याय 14 श्लोक 19)
गीता अध्याय 14 श्लोक 20 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि देहधारी मनुष्य इन तीनों का उल्लंघन करके अर्थात् इन तीनों की पूजा त्यागकर ही जन्म-मरण तथा वृद्धावस्था के तथा अन्य सब दुःखों से मुक्त होकर परमानन्द अर्थात् गीता अध्याय 18 श्लोक 62 तथा अध्याय 15 श्लोक 4 में वर्णित परम शान्ति तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होता है।
सारांश:- तीनों देवताओं (ब्रह्मा जी रजगुण, विष्णु जी सतगुण तथा शिव जी तमगुण) की पूजा करने वाले राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख कहा है। भावार्थ है कि इनकी पूजा नहीं करनी चाहिए।
कारण:- 1. श्री ब्रह्मा जी रजगुण की पूजा हिरण्यकश्यप ने की थी, अपने पुत्रा प्रहलाद का शत्राु बन गया, राक्षस कहलाया, कुत्ते वाली मौत मरा। 
2. श्री शिव जी तमगुण की पूजा रावण ने की थी, जगतजननी सीता को उठाया, पत्नी बनाने की कुचेष्टा की, राक्षस कहलाया, कुत्ते की मौत मरा। भस्मासुर ने भी तमगुण शिव जी की पूजा की थी, राक्षस कहलाया, बेमौत मारा गया।
3. श्री विष्णु जी की पूजा करने वाले वैष्णव कहलाते हंै। एक समय हरिद्वार में एक कुम्भ का पर्व लगा। उस पर्व में स्नान करने के लिए सर्व सन्त ़(गिरी, पुरी, नाथ, नागा) पहुँच गए। नागा श्री शिव जी तमगुण के पुजारी होते हैं तथा वैष्णव श्री विष्णु सतगुण के पुजारी होते हैं। सभी हरिद्वार में हर की पैड़ी पर स्नान करने की तैयारी करने लगे जो सँख्या में लगभग 20 हजार थे। कुछ देर बाद इतनी ही सँख्या में वैष्णव साधु हर की पैड़ियों पर पहुँच गए। वैष्णव साधुओं ने नागाओं से कहा कि हम श्रेष्ठ हैं, हम पहले स्नान करेंगे। इसी बात पर झगड़ा हो गया। तलवार, कटारी, छुरों से लड़ने लगे, लगभग 25 हजार दोनों पक्षों के साधु तीनों गुणों के उपासक कटकर मर गए।
इसलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) के उपासकों को राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख कहा है।
इससे सिद्ध हुआ कि श्री ब्रह्मा रजगुण, श्री विष्णु सतगुण तथा श्री शिव तमगुण की भक्ति करने वाले मूर्ख, राक्षस, मनुष्यों में नीच तथा घटिया कर्म करने वाले मूर्ख व्यक्ति हंै अर्थात् इनकी पूजा करना श्रीमद् भगवत गीता में मना किया है, इनकी ईष्ट रूप में पूजा करना व्यर्थ है।
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1 Comments

  1. जब हमारे सर्व पवित्र धर्म एवं ग्रंथों के इतने आधार दिए गए हैं, उनको देखने के बावजूद भी हम उनको स्वीकार नहीं करेंगे, तो हम मनुष्य होने के लायक भी नहीं हैं। मनुष्य जन्म कितने ही पुण्य के बावजूद मिलता है और इस जन्म का मूल उद्देश्य होता है मुक्ति प्राप्त करना।।
    जब सर्व ग्रंथ के प्रमाण रहे हैं, पूर्णब्रह्म परमात्मा कबीर साहिब हैं तो हमें भी इस भक्ति मार्ग को अपना लेना चाहिए।।
    विस्तृत जानकारी के लिए देख सकते हैं आप साधना चैनल 7:30 से 8:30 पीएम

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